कितनी कच्ची- दीवारों को
हमने, तुमने बांध दिया था
तिनके-तिनके कितने बीने
तब जीने का नाम लिया था /
नहीं पता था उन महलों का
जो निर्मित पत्थर से होते
हमने दिल के तटबंधों को
जज्बातों से थाम लिया था /
कतरे-कतरे सपने बुनकर
तुम हाथों पर रख देती थीं
जब मैं उनमें खो जाता था
तुम बांहों में भर लेती थीं /
नहीं पता था तूफानों का
जिनसे छप्पर उड़ जाते थे
हमने-तुमने अरमानों का
कसकर छाता तान लिया था /
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