गुरुवार, 31 जनवरी 2013


जबसे हमने जीना सीखा रोना सीखा ,हँसना सीखा जितनी भी मुश्किल आईं थीं हर मुश्किल से लड़ना सीखा \ प्यार बहुत था मन में अपने उसे बसाया,उसे लुटाया नफरत करने वाले भी थे उनसे थोड़ा बचना सीखा / चन्द लकीरों का क्या गिनना जिसने खींची वो ही जाने हमने अपनी मेहनत से ही जीना सीखा, मरना सीखा /

मंगलवार, 22 जनवरी 2013


इस तरफ खामोश तट पर किश्तियां ठहरी हुई हैं उस तरफ ,उस पार का वो द्रश्य देखे जा रहा हूँ / बीच में उत्ताल लहरें इस कदर फैली हुई हैं मैं तरंगित से जलधि को पार करने जा रहा हूँ / थी हकीकत प्यार में जो,बेतहाशा दिख रही थी दूर तक फैले समुंदर ,ज्वार से भरने लगे थे / है अगर अनजान मंजिल तो उसे आसान कर दो प्यार में गुजरे पलों को तुम जरा नीलाम कर दो / डूब जाओ ,बांट डालो,प्यार की हर पर्त खोलो इस तरह अपनी सुहानी जिन्दगी की शाम कर दो / जिन्दगी इतनी सुहानी क्यों हमें लगने लगी थी क्यों यहाँ मौसम हमारे साथ में चलने लगे थे क्यों हमें लगने लगा था यह जहां है बस हमारा क्यों हमारी हसरतों में पंख -से उगने लगे थे ? कसमसाते प्यार की दुनिया बसाए जा रहे हैं आदमी को आदमी -सा हम बनाये जा रहे हैं / बेखबर क्यों प्यार से रहने लगा हर आदमी अब प्यार यह क्या चीज है उसको बताये जा रहे हैं / लोग शिकवा कर रहे हैं और ताने दे रहे हैं बेवफाई के हजारों ही उलाहने दे रहे हैं क्यों नहीं समझे यहां वो , है समर्पण प्यार में बस प्यार के अंतिम पलों को, हम भुनाए जा रहे हैं / कसमसाते प्यार की दुनिया बसाए जा रहे हैं आदमी को आदमी -सा हम बनाये जा रहे हैं / बेखबर क्यों प्यार से रहने लगा हर आदमी अब प्यार यह क्या चीज है उसको बताये जा रहे हैं / आदमी की मुस्कुराहट देखने की जिद हमें है इसलिए गम के खजाने हम लुटाये जा रहे हैं / है अगर अनजान मंजिल तो उसे आसान कर दो प्यार में गुजरे पलों को तुम जरा नीलाम कर दो / जमीं रहतीं हैं पलकें क्यों तुम्हारे ही ख्यालों में ख्यालों की नुमाइश को लगाये जा रहा हूँ मैं ? मुझे मालूम है दुनिया यह तिनकों का घरोंदा है हजारों बीन कर लाया लुटाये जा रहा हूँ मैं / बहुत उम्मीदियां लेकर बुलाये जा रहा हूँ मैं दिशाओं के धुंधलके भी हटाए जा रहा हूँ मैं / वही , आबाज जब तक मैं न सुन लूँगा तुम्हारी वो न जाने किन दिवारों को गिराए जा रहा हूँ मैं ?

कितनी कच्ची- दीवारों को हमने, तुमने बांध दिया था तिनके-तिनके कितने बीने तब जीने का नाम लिया था / नहीं पता था उन महलों का जो निर्मित पत्थर से होते हमने दिल के तटबंधों को जज्बातों से थाम लिया था / कतरे-कतरे सपने बुनकर तुम हाथों पर रख देती थीं जब मैं उनमें खो जाता था तुम बांहों में भर लेती थीं / नहीं पता था तूफानों का जिनसे छप्पर उड़ जाते थे हमने-तुमने अरमानों का कसकर छाता तान लिया था /
कितनी कच्ची- दीवारों को हमने, तुमने बांध दिया था तिनके-तिनके कितने बीने तब जीने का नाम लिया था / नहीं पता था उन महलों का जो निर्मित पत्थर से होते हमने दिल के तटबंधों को जज्बातों से थाम लिया था / कतरे-कतरे सपने बुनकर तुम हाथों पर रख देती थीं जब मैं उनमें खो जाता था तुम बांहों में भर लेती थीं / नहीं पता था तूफानों का जिनसे छप्पर उड़ जाते थे हमने-तुमने अरमानों का कसकर छाता तान लिया था / आखिर कितने नजराने हैं इस दुनिया में इस जीवन के आखिर कितने दिए जलाने हैं दुनिया में इस जीवन के ? कभी जलाए जाते हैं तो कभी बुझाए जाते हैं यह आखिर कितने अफ़साने हैं इस दुनिया में इस जीवन के ? कभी खुशी से छलके आंसू कभी गमों ने डरा दिया था कितने मंदिर ,कितने मस्जिद पैमाने हैं इस जीवन के ? चलो, वतन के शहजादों तुम तूफानों से इसे बचा लो इसमें भर दो जीवन अपना सपने, सब साकार करा दो / इसकी नदियों का पानी क्यों मैला प्रतिदिन होता जाता अपने आंसू से सींचो तुम ऐसी अमृत - धार बहा दो / देखो,कोई निकल न पाए जर्जर, जो इसको कर जाए इसकी ताकत लोहा बनकर सीने की तुम दाळ बना लो / अगर हिफाजत जो करनी है सच्चाई से करो हिफाजत कर्णधार जो बने लुटेरे उनकी मिट्टी -खार करा दो / जब दुनिया के लोगों की हसरत मुझसे जुड़ जाती है उस दिन शायद मुझको अपना मन दीवाना -सा लगता है / लोगों का दिल अब मेरा है विश्वास बहुत हो जाता है मुझको अपने दिल का जैसे भरा- खजाना -सा लगता है / कितने मीठे- मीठे सपने पलकों में मुंद -मुंद जाते हैं एक नशीले से मौसम का रूप -सुहाना -सा लगता है /