मंगलवार, 22 जनवरी 2013

कितनी कच्ची- दीवारों को हमने, तुमने बांध दिया था तिनके-तिनके कितने बीने तब जीने का नाम लिया था / नहीं पता था उन महलों का जो निर्मित पत्थर से होते हमने दिल के तटबंधों को जज्बातों से थाम लिया था / कतरे-कतरे सपने बुनकर तुम हाथों पर रख देती थीं जब मैं उनमें खो जाता था तुम बांहों में भर लेती थीं / नहीं पता था तूफानों का जिनसे छप्पर उड़ जाते थे हमने-तुमने अरमानों का कसकर छाता तान लिया था / आखिर कितने नजराने हैं इस दुनिया में इस जीवन के आखिर कितने दिए जलाने हैं दुनिया में इस जीवन के ? कभी जलाए जाते हैं तो कभी बुझाए जाते हैं यह आखिर कितने अफ़साने हैं इस दुनिया में इस जीवन के ? कभी खुशी से छलके आंसू कभी गमों ने डरा दिया था कितने मंदिर ,कितने मस्जिद पैमाने हैं इस जीवन के ? चलो, वतन के शहजादों तुम तूफानों से इसे बचा लो इसमें भर दो जीवन अपना सपने, सब साकार करा दो / इसकी नदियों का पानी क्यों मैला प्रतिदिन होता जाता अपने आंसू से सींचो तुम ऐसी अमृत - धार बहा दो / देखो,कोई निकल न पाए जर्जर, जो इसको कर जाए इसकी ताकत लोहा बनकर सीने की तुम दाळ बना लो / अगर हिफाजत जो करनी है सच्चाई से करो हिफाजत कर्णधार जो बने लुटेरे उनकी मिट्टी -खार करा दो / जब दुनिया के लोगों की हसरत मुझसे जुड़ जाती है उस दिन शायद मुझको अपना मन दीवाना -सा लगता है / लोगों का दिल अब मेरा है विश्वास बहुत हो जाता है मुझको अपने दिल का जैसे भरा- खजाना -सा लगता है / कितने मीठे- मीठे सपने पलकों में मुंद -मुंद जाते हैं एक नशीले से मौसम का रूप -सुहाना -सा लगता है /

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